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*ब्रेकिंग रिपोर्ट । ब्यूरो नवीन प्रकाश सिंह लेह: छात्रों के बेतहाशा आंदोलन और बीजेपी कार्यालय में आग*लेह में आज बड़े पैमाने पर विद्यार्थियों व युवाओं का प्रदर्शन हिंसक रूप ले लिया प्रदर्शनकारियों ने शहर में मौजूद बीजेपी कार्यालय पर आग लगाई और बाहर खड़ी एक सुरक्षा/द्वार वाहन को भी जला दिया। इससे पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। यह प्रदर्शन लद्दाख को पूर्ण राज्य (statehood) व/या छठे अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत विशेष स्वायत्तता देने की लंबे समय से चली आ रही माँगों से जुड़ा है — पिछले कुछ महीनों में यह माँगें फिर तेज हुई हैं और अगस्त-सितंबर 2025 में कई धरना-आन्दोलन व अनशन हुए हैं। *संदर्भ और पृष्ठभूमि*5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 की विशेष स्थिति हटाकर जम्मू कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों। (i) जम्मू व कश्मीर व(ii) लद्दाख में विभाजित कर दिया। उसी निर्णय के साथ लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory) के रूप में राज्य का दर्जा नहीं देकर विधानमण्डल/विधायी स्वायत्तता से वंचित रखा गया। इसके बाद से ही लेह व कारगिल में अलग-अलग राजनीतिक समूह, नागरिक-संगठन और युवा निकाय समय-समय पर “पूर्ण राज्य” या छठी अनुसूची में शामिल करने की माँग उठा रहे हैं। *हाल की घटनाओं का समयरेखा (संक्षेप)*अगस्त 2025 — कारगिल में तीसरे दिन तक चलने वाले हंगर-स्टाइक/धरने हुए, जिनमें छठी अनुसूची व राज्यत्व की माँगें प्रमुख रहीं। सितंबर 2025 (प्रारम्भ/दौरा) — लेह में नागरिक व छात्र समूह एक्टिव हुए; कुछ नेताओं व एक्टिविस्टों (जैसे सोनम वांगचुक) ने अनशन/लंबे प्रदर्शनों की घोषणा की; प्रशासन के साथ बातचीत की मांग उठी। आज (रिपोर्ट के दिन) — बड़े पैमाने पर प्रदर्शन के दौरान कई स्थानों पर पत्थरबाज़ी व झड़पें; लेह के स्थानीय बीजेपी कार्यालय में आग लगना और सुरक्षा वाहन को जलाना प्रमुख हिंसक घटनाएँ रहीं; सुरक्षा बलों ने आंसू गैस व बैटन चार्ज का सहारा लिया। *आंदोलन के कारण — गहराई में*1. वहींन प्रतिनिधित्व और विधायी शक्ति की कमी: UT का दर्जा मिलने के बावजूद लद्दाख को विधानसभा/विधानमंडल नहीं मिला, जिससे स्थानीय लोगों को अपना चुना हुआ विधायी मंच नहीं मिला — वे स्थानीय नीतियों और संसाधनों पर प्रभाव चाहते हैं। 2. भूमि, रोज़गार और सांस्कृतिक सुरक्षा: अनुच्छेद 370 हटने के बाद भूमि-हक, प्रवेश (settlement), नौकरियों व संसाधनों के अधिकार को लेकर स्थानीय चिंताएं उभरीं — जिससे लोगों को डर है कि बाहरी निवेश/आबादी पारंपरिक संरचना व संसाधनों पर प्रभाव डाल सकती है। 3. छठी अनुसूची की माँग: अनेक समुदाय छठी अनुसूची (जो आदिवासी/जनजातीय इलाकों को विशेष संरक्षण देती है) के अंतर्गत आने की माँग कर रहे हैं ताकि भूमि-नियंत्रण, प्रशासनिक स्वायत्तता और सांस्कृतिक संरक्षण कानूनी तौर पर सुरक्षित हो सके। *कड़ी प्रतिक्रिया और असर*प्रशासन व सुरक्षा: घटनास्थल पर अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए और स्थिति पर काबू पाने के लिए भी कदम उठाए गए; कुछ जगहों पर धारा 144/निषेधाज्ञा व पुलिस कार्रवाई की खबरें आईं। (नोट: स्थानीय प्रबंधन/कठोर सुरक्षा उपायों की विस्तृत जानकारी प्रशासनिक विज्ञप्ति पर निर्भर करेगी)। राजनीतिक प्रभाव: राज्यत्व/छठी अनुसूची का मुद्दा अब राष्ट्रीय स्तर पर भी अधिक ध्यान आकर्षित कर रहा है यह केन्द्र और स्थानीय निकायों के बीच वार्ता का विषय बनता जा रहा है। स्थानीय जीवन पर प्रभाव: विरोध प्रदर्शनों के चलते यातायात, बाजार तथा शैक्षणिक संस्थाओं पर प्रभाव पड़ा; आगजनी जैसी घटनाओं से संपत्ति व सामान्य लोगों की सुरक्षा पर असर हुआ है। *मुख्य हितधारक* स्थानीय निकाय व युवा संगठन: Apex Body Leh (ABL) और अन्य विद्यार्थी/युवा निकाय जो राज्यत्व तथा छठी अनुसूची की माँग कर रहे हैं। राजनीतिक दल: स्थानीय स्तर पर भाजपा सहित अन्य दलों के कार्यालय और कार्यकर्ता सीधे प्रभाव में हैं आज की आगजनी में भाजपा कार्यालय निशाना बना। *कानूनी व संवैधानिक आयाम*लद्दाख को 2019 में UT का दर्जा मिला; पूर्ण राज्यत्व देने के लिए संविधानिक प्रक्रिया तथा संसद में विधेयक/कानूनी संशोधन आवश्यक होगा। छठी अनुसूची में शामिल करने के लिए भी संवैधानिक/न्यायिक व प्रशासनिक परिपथों से गुज़रना होगा। ऐसे प्रस्तावों का प्रभाव सीमाओं, संसाधन-वितरण और स्थानीय प्रशासन पर सुदूरगामी होगा। *जोखिम और संभावना*जोखिम: अगर हिंसा बढ़ती है तो नागरिक हिंसा, संपत्ति को क्षति और व्यापक अशांति की आशंका रहती है; लंबी अवधि के लिए पर्यटन तथा अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। संभावना: शान्तिपूर्ण वार्ता, मध्यस्थता (स्थानीय नेताओं और केंद्रीय प्रतिनिधि के बीच) और स्पष्ट रोडमैप (छठी अनुसूची/विधायी विकल्पों पर बातचीत) से स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। हालिया अनशन/धरनाओं ने केंद्र की तरफ बातचीत की संभावना बढ़ाई है — यह एक संवाद का अवसर भी बन सकता है। *सुझाव (प्रासंगिक और व्यवहारिक)*1. तुरंत अमन-शान्ति पहल: स्थानीय प्रशासन को प्रदर्शनकारियों और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए परोक्ष हिंसा रोकनी चाहिए; अनावश्यक आक्रामकता से बचते हुए जवावदेही बनानी चाहिए। 2. तुरंत संवाद/बैठक: केंद्र व राज्य/यूटी प्रतिनिधियों को स्थानीय apex bodies, युवा नेताओं व समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ त्वरित और पारदर्शी बातचीत आरम्भ करनी चाहिए — बातचीत के लिए समयबद्ध एजेंडा घोषित किया जाना चाहिए। 3. न्यायिक/नागरिक रास्ते: संवैधानिक व कानूनी विकल्पों की विवेचना के लिए विशेषज्ञ पैनल/कमीशन गठित किया जाए ताकि छठी अनुसूची, राज्यत्व और स्थानीय अधिकारों पर ठोस रिपोर्ट/सिफारिशें मिलें। 4. सुरक्षा बनाम संवेदनशीलता: सुरक्षा उपाय लागू करते समय सांस्कृतिक-संवेदनशीलता और स्थानीय जीवन-यापन पर प्रभाव का आकलन आवश्यक है — भारी तैनाती से स्थानीय असंतोष और भी बढ़ सकता है। *निष्कर्ष*लेह में हुई आगजनी व हिंसा सिर्फ एक घटना नहीं है — यह वर्षों की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चिंताओं का उभार है। अनुच्छेद 370 के हटने और लद्दाख को UT बनाए जाने के बाद से चल रही असंतुष्टि अब संगठित मांगों के रूप में सामने आ रही है — जिनमें राज्यत्व और छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा प्रमुख हैं। हालिया हिंसा ने मुद्दे को राष्ट्रीय ध्यान दिलाया है; पर समाधान के लिए ताकत का उपयोग कम और परामर्श/वार्ता अधिक आवश्यक है। तत्काल परिदृश्य में शान्ति बहाल करना, बातचीत शुरू करना और दीर्घकालिक संवैधानिक विकल्पों पर तेज़ी से काम करना ही व्यवहारिक रास्ता दिखता है।

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