*-सरकारी वकीलों की नियुक्ति पर उठा विवाद, हाईकोर्ट ने मांगी सफाई*लखनऊ,इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में सरकारी वकीलों की नियुक्तियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सोमवार को हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने अनुभवहीन वकीलों को अधिवक्ता बनाकर न्यायिक कामकाज की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा कर दिया है।याचिकाकर्ताओं के आरोपयाचिकाकर्ताओं का कहना है कि—नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं अपनाई गई।कई ऐसे अधिवक्ता नियुक्त कर दिए गए जिनके पास पर्याप्त अनुभव नहीं है।पहले से ही सीनियर अधिवक्ता काम की कमी झेल रहे हैं, फिर भी नए वकीलों की भर्ती कर दी गई।मनमानी नियुक्तियों से न्यायालय के कार्य की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा। राज्य सरकार की दलील,मामले में राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता अजय मिश्रा ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दलीलें पेश कीं। सरकार का पक्ष यह है कि नियुक्ति प्रक्रिया नियमों के अनुरूप की गई है और आवश्यकता के हिसाब से अधिवक्ता नियुक्त किए गए हैं।हाईकोर्ट की टिप्पणी और अगली सुनवाई,हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को तय की है। अदालत ने संकेत दिया है कि नियुक्तियों की पारदर्शिता और वैधता पर विस्तृत सुनवाई आवश्यक है।पृष्ठभूमि,गौरतलब है कि हाल ही में प्रदेश सरकार ने बड़ी संख्या में नए सरकारी वकीलों की नियुक्ति की थी। इसके बाद अधिवक्ता जगत में नाराजगी बढ़ गई और कई वरिष्ठ वकीलों ने इसे चुनौती दी। याचिकाओं में कहा गया है कि योग्य और अनुभवी अधिवक्ताओं की अनदेखी कर राजनीतिक व व्यक्तिगत लाभ के आधार पर चयन किया गया।संभावित असर यह मामला केवल नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे न्यायालयों के सुचारु संचालन, सरकार की विश्वसनीयता और अधिवक्ता समुदाय के मनोबल पर भी असर पड़ सकता है। यदि हाईकोर्ट नियुक्ति प्रक्रिया पर सख्त रुख अपनाता है तो आने वाले समय में सरकारी वकीलों की नियुक्ति व्यवस्था में बड़े बदलाव संभव हैं। ब्यूरो: नवीन प्रकाश सिंह।
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