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अल्लाह के प्रति त्याग और समर्पण का पर्व है बकरीद, इस्लाम में है। कुर्बानी और बलिदान का महत्व काशी दीप विज़न जमानियां। शनिवार को 7 जून को ईद उल अजहा बकरीद का पर्व नगर कस्बा बाजार सहित ग्रामीण अंचलों में नमाज के बाद शांति पूर्ण संपन्न हुआ। मुस्लिम भाई अपने मरहूमो के कब्रिस्तान पहुंचकर मगफिरत की दुआ मांगी। बताया जाता है। कि अक्सर लोगों के मन में बकरीद की कुर्बानी को लेकर कई तरह के सवाल होते हैं। दरअसल, यह त्योहार कुर्बानी की परंपरा के लिए जाना जाता है। जो अल्लाह के प्रति गहरे विश्वास और त्याग का प्रतीक है। बताया जाता हैं। कि नगर कस्बा स्थित मस्जिद और ईदगाहों में सुबह 7 बजे, 7.30, ईदगाह लोदीपुर में 7,अमानत खा की मस्जिद में 6.45 बजे नमाज के बाद हर्षौल्लास के साथ बकरीद ईद उल अजहा पर्व को मनाई गई। बता दें कि बकरीद, जिसे ईद-उल-अज़हा या ईद-उल-ज़ुहा के नाम से भी जाना जाता है, इस्लाम धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। यह पर्व हर साल इस्लामिक कैलेंडर के आखिरी महीने, ज़ु-अल-हिज्जा की 10 वीं तारीख को मनाया जाता है। बकरीद 7 जून, शनिवार को मनाई सादगी ढंग से मनाया गया। यह त्योहार रमजान की समाप्ति के लगभग 70 दिनों बाद आता है। और हज के साथ भी जुड़ा हुआ है। बकरीद का महत्व कुर्बानी की परंपरा से जुड़ा हुआ है। बकरीद पर कुर्बानी का महत्व अल्लाह की राह में सबकुछ कुर्बानी जान, मॉल के साथ हर एक चीज की कुर्बानी जायजा है। शाही जामा मस्जिद के सेकेट्री मौलाना तनवीर रजा ने बताया कि बकरीद का त्योहार हजरत इब्राहिम की अल्लाह के प्रति अटूट भक्ति और समर्पण की याद में मनाया जाता है। हजरत इब्राहिम को अल्लाह ने सपने में अपनी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देने का आदेश दिया। जिससे इब्राहिम 90 वर्ष की आयु में बेटा इस्माइल नसीब हुआ था। और अपने बेटे से बेहद प्यार करते थे। फिर भी उन्होंने अल्लाह के हुक्म का पालन करने का निर्णय लिया। जब उन्होंने इस्माइल को कुर्बानी के लिए तैयार किया। तो इस्माइल ने भी सहर्ष सहमति दी। लेकिन जैसे ही इब्राहिम ने कुर्बानी शुरू किया। अल्लाह ने चमत्कार किया और इस्माइल की जगह एक मेमने (दुंबा) को कुर्बान कर दिया। इस घटना ने इब्राहिम की भक्ति और आज्ञाकारिता को सिद्ध किया। और तब से बकरीद पर कुर्बानी की परंपरा शुरू हुई। उन्होंने बताया कि कुर्बानी का महत्व केवल बलिदान तक सीमित नहीं है। यह त्याग, समर्पण और अल्लाह के प्रति पूर्ण विश्वास का प्रतीक है। इस दिन मुसलमान हलाल जानवर जैसे बकरे, भेड़ या ऊंट की कुर्बानी देते हैं। कुर्बानी के लिए जानवर का स्वस्थ और बालिग होना जरूरी है। कुर्बानी का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है। एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए, और तीसरा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए। यह प्रथा समाज में एकता, भाईचारे और दान की भावना को बढ़ावा देती है। रजा ने बताया कि इस्लाम में कुर्बानी को सवाब का काम माना जाता है। और यह हर सक्षम मुसलमान के लिए वाजिब है। यानी ऐसा कर्तव्य जो फर्ज से ठीक नीचे आता है। बकरीद का एक और महत्वपूर्ण संदेश यह है। कि यह हमें स्वार्थ से ऊपर उठकर मानवता की सेवा करने की प्रेरणा देता है। हजरत इब्राहिम का त्याग हमें सिखाता है। कि अल्लाह के प्रति सच्ची भक्ति और विश्वास जीवन के सबसे कठिन निर्णयों में भी हमें सही मार्ग दिखा सकता है। इसके अलावा यह पर्व हज के साथ भी जुड़ा है। जो इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है। हज के दौरान भी कुर्बानी की जाती है। जो हजरत इब्राहिम और उनके परिवार की कुर्बानी को याद करता है। ईदगाह लोदीपुर के इमाम असरफ करीम कादरी ने बताया कि बकरीद का त्योहार हमें बलिदान, त्याग और भाईचारे का संदेश देता है। यह न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। इस पर्व पर मुसलमान नमाज अदा करते हैं। नए कपड़े पहनते हैं। और अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ खुशियां बांटते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है। कि सच्चा बलिदान वही है। जो दूसरों के लिए किया जाए। सलीम मंसूरी की रिपोर्ट

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