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ग्यारहवीं शरीफ के महत्व,अमीरी-गरीबी, जात-पात से ऊपर उठकर सबके साथ समान व्यवहार करने का संदेश दिया।जमानियां। इस्लामी परंपरा में अनेक औलिया-ए-किराम अल्लाह के नजदीकी वंदे हुए हैं। जिनकी याद में उर्स और विशेष पर्व मनाए जाते हैं। उन्हीं में एक महान सूफी संत हजरत शेख अब्दुल कादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह है। इन्हें दुनिया भर के मुसलमान गौस-ए-आजम के नाम से जानते हैं। उनकी याद में इस्लामी माह के 11वें दिन ग्यारहवीं शरीफ का आयोजन पठान टोली निवासी मोहम्मद आरिफ खान वारसी के मकान पर किया गया। उन्होंने अकीदत के साथ इबादत, कुरआन ख्वानी और लंगर (सामूहिक भोजन यानि बड़ा देग गौस पाक के नाम पर फातिहा कराया और सभी मौजूद मुस्लिम भाइयों को खिलाया। बताया जाता है। कि गौस पाक का जीवन और परिचय इस प्रकार है। हजरत शेख अब्दुल कादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह का जन्म 1077 ई (470 हिजरी) में ईरान के गिलान प्रांत के निफ नामक स्थान पर हुआ था। आप पैगम्बर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद (स.) की नस्ल से थे। यानी सैयद थे। बचपन से ही इनमें तकवा (पवित्रता), इल्म (ज्ञान) और अल्लाह से गहरी मुहब्बत पायी जाती थी। इस दौरान मौलाना जैनुलआब्दीन ने बताया कि आप ने इराक के बगदाद में इस्लामी शिक्षा हासिल की और तसव्वुफ (सूफी मत) की ऊंचाइयों को छू लिया। आपकी ख्याति इतनी फैल गई। कि दूर-दराज से लोग आपके पास रहनुमा और रहमत की तलाश में आते थे। शाही जामा मस्जिद के सेकेट्री मौलाना तनवीर रजा ने बताया कि ग्यारहवीं शरीफ दरअसल हजरत गौस पाक की याद और उनकी रूह को इसाल-ए-सवाब ( पहुंचाने) का दिन है। इस्लामी माह के हर 11वें दिन उनकी याद में फातिहा (दुआ), कुरआन शरीफ की तिलावत और लंगर का आयोजन किया जाता है। उन्हीं की याद में पठान टोली मोहल्ला निवासी मोहम्मद आरिफ खान वारसी के द्वारा ग्यारहवीं के मौके पर बड़े देग का आयोजन अपने मकान पर बनवाया और फातिहा कराने के बाद सभी मुस्लिम भाइयों को खिलवाया। क्योंकि गौस पाक का उर्स 11 रबी-उस-सानी को होता है। और उनकी याद में हर महीने की 11 तारीख को फातिहा की जाती है। मोहम्मद आरिफ खान वारसी ने बताया कि ग्यारहवीं शरीफ के महत्व इसी से लगाया जा सकता है। कि गरीब हो या अमीर सभी मुस्लिम घरों में फातिहा कराई जाती है। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान अक्सर आत्मिक शांति से दूर होता जा रहा है। ग्यारहवीं शरीफ का पर्व हमें यह याद दिलाता है। कि इंसानियत की सेवा सबसे बड़ी इबादत है। अल्लाह की रजा (खुशी) केवल नमाज और रोजे से नहीं। बल्कि नेक इंसानी गुणों से भी हासिल होती है। नफरत और तकरार से बचकर मोहब्बत और भाईचारा फैलाना ही औलिया-ए-किराम का असली पैगाम रहा है। गौस-ए-आजम की शिक्षा तकवा और परहेजगारी,आप हमेशा अल्लाह की इबादत और नेकी के रास्ते पर चलने की हिदायत देते थे। इंसानियत और भाईचारा, अमीरी-गरीबी, जात-पात से ऊपर उठकर सबके साथ समान व्यवहार करने का संदेश दिया। सच्चाई और सब्र, आपकी सबसे बड़ी शिक्षा यह थी कि मुश्किल हालात में भी इंसान अल्लाह पर भरोसा रखे और सब्र करे। ग़रीबों की सेवा, आप जरूरतमंदों और ग़रीबों की मदद को इबादत का दर्जा देते थे। उक्त मौके पर हयात वारिस खान, निसात खान वारसी उर्फ प्रिंस, आसिम खान वारसी उर्फ सोनू पंडित, इरफान खान, असलम पान वाले, शहजाद अली वारसी, शमीम खान, सैय्यर खान वारसी सहित सैकड़ों को शामिल रहे। सलीम मंसूरी की रिपोर्ट जमानिया

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