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वाराणसी, काशी की सृजन परम्परा में प्रेमचंद और बंग महिला की गूंज वाराणसी -- राजकीय जिला पुस्तकालय (एलटी कॉलेज) अर्दली बाजार में रविवार को हिंदी साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी की धरोहर, काशी की सृजन की परम्परा बिषयक व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार डा.रामसुधार सिंह ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद अपने समय की धड़कन को बहुत करीब से देख रहे थे। वो देख रहे थे कि देश के अर्थ तंत्र की रीढ़ किसान दुखी है,स्त्री और दलित को समाज में उनका उचित स्थान प्राप्त नहीं है, समाज ऊंच- नीच, अमीर- गरीब में बंटा हुआ है। ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता केवल राजनीतिक हस्तांतरण होगी। बंग महिला ने ऐसे समय कहानी लिखना शुरू किया जब कहानी को युवाओं को बिगाड़ने वाली चीज माना जाता था। ऐसे समय में राजेंद्र बाला घोष को अपना वास्तविक नाम छुपा कर बंग महिला नाम से लिखना पड़ा। प्रेमचंद के अवदान पर प्रो.बलराज पाण्डेय ने कहा कि हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के द्वारा जो महत्व प्राप्त किया है वह किसी भी कथाकार के लिए स्पर्धा का भविष्य हो सकता है। राजेन्द्र बाला घोष बंग महिला का योगदान पर डा. मुक्ता ने कहा कि राजेंद्र बाला घोष ने उस काल में जन्म लिया जब स्त्रियां असूर्यमपश्यायें हुआ करती थीं और बाल विवाह का अटल साम्राज्य था।राजेन्द्र बाला का जन्म 982 में काशी के कोदई चौकी मुहल्ले में हुआ था। इस कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा पंडित विद्यानिवास मिश्र तथा प्रेमचंद व बंग महिला के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन कर कराया गया। स्वागत उद्बोधन विद्याश्री न्यास के सचिव डॉक्टर दया निधि मिश्रा द्वारा किया गया और कंचन सिंह परिहार द्वारा सरस्वती बन्दना की प्रस्तुति की गयी। इस कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध गीतकार डॉक्टर अशोक कुमार सिंह ने तथा धन्यवाद ज्ञापित सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। इस अवसर पर प्रोफेसर अमिताभ शंकर राव, गिरिजेश तिवारी, अमृत, विजय चंद्र त्रिपाठी, सिद्धनाथ शर्मा, गिरीश पाण्डेय सहित काफी संख्या में कवि, लेखक,छात्र व छात्राएं उपस्थित रहे। सभा को सम्बोधित करते साहित्यकार डा.रामसुधार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र गुप्ता

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