जमानियां क्षेत्र के सराय मुराद अली स्थित सरइया गांव स्थित शेखेदीन शेख अहमद मकदूम बाबा रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह पर पूरी होती मन की मुराद।जमानियां। क्षेत्र के सराय मुराद अली सरैया गांव स्थित हजरत शेखेदीन शेख अमजद मकदूम बाबा रहमतुल्लाह अलैह, दरगाह मशहूर है। उनके मजार पर दूर दराज एवं उनके आसपास के सैकड़ों महिला पुरुष मत्था टेकने आते हैं। यहां पर जिसने भी मत्था टेका उसे शहीद बाबा का आशीर्वाद मिला। लोगों के अनुसार शहीद बाबा के मजार पर मत्था टेकने और पलकों पर मजार के चादर लगाने से दिल को सुकून मिलता है। ऐसा लगता है कि शहीद बाबा ने शरीर का दुःख हर लिया है। लोगों के मुख से सुनकर और अकीदे के तहत मन्नतें और ख्वाहिशें लेकर शहीद बाबा के मजार पर लोग पहुंचते हैं। बताया जा रहा है। कि हजरत शेखेदिन शेख अहमद मकदूम शाह बाबा दरगाह की देख रेख एक हिन्दू भाई जिनका नाम प्रभु यादव है। 1998 से उनकी खिदमत करते आ रहे है। दरगाह की मरम्मत से लेकर रंग रोगन सहित उर्स का आयोजन भी किया करते रहते है। इसके साथ ही दरगाह के मुख्यद्वार से मन में एक अजीब सी उलझन होता है। जिसका उत्तर मजार पर मत्था टेककर निकलने के बाद मिल भी जाता है। अकीकत मंद लोग जैसे ही बाबा की मजार पर पहुंचते ही मानो नजरें ठहर जाती है। मजार पर सिंदूरी रंग की चादर को एकटक निहारता रह जाते है। मजार के पास खिदमत करने वाले के साथ खड़े शांति एकता कमेटी के सरपरस्त नेसार अहमद खान वारसी ने दो कदम आगे बढ़कर जब मजार पर मत्था टेका और मजार की चादर को पलकों पर लगाया, तब शरीर में एक अजीब प्रकार की ऊर्जा महसूस की। और दिल की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। ऐसा लग रहा था कि बाबा का प्यार स्नेह बरस रहा हो। खिदमत करने वाले प्रभु यादव ने बताया कि सबसे पहले मुझे बुलावा वारसी पिया कि आया। उनके हुक्म से हजरत शेखेदिन शेख अहमद रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत करने का मौका मिला। लगभग 25 साल के आसपास से उनकी खिदमत करता आ रहा हूं। उन्होंने बताया कि मजार पर आने से पहले मन में जो भी मन्नतें मांगने की इच्छा थी। वह सब भूल गया। कहते हैं खुदा सबका ख्याल रखता है। वह किसी के साथ नाइंसाफी नहीं करता है। ऐसे में सूफी बाबा से क्या मांगना। वे तो अपने दरबार में आने वाले लोगों के दिन की बात जान लेते है। बिना मांगें वह मन की मुराद को पूरी कर देते हैं। प्रभु यादव ने बताया कि इस दरगाह पर हर कौम के लोग आते हैं। यहां पर आने वाला कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता है। यहां कोई भी भेदभाव नहीं होता है। यह दरगाह कौमी एकता का प्रतीक है। दरगाह पर सभी धर्म के लोगों का समान आस्था है। हजरत शेखेदिन शेख अहमद मकदूम शाह रहमतुल्ला अलैह का जन्म अरब से आकर सराय मुराद अली सरैया गांव अपना ठिकाना बना लिया। वह बचपन से ही सूफी विचार रखते थे। उनकी विद्वता व उदारता उनके ग्रंथों में सहज ही झलकती है। मकदूम अहमद शाह की शोहरत तेजी से आसपास के इलाकों में बढ़ती गई।ऐसी मान्यता है। कि बाबा के हाथों के लिखे कुरान-ए-पाक की स्याही व कागज तकरीबन साल बाद भी जस का तस चमकदार है। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसे मजार के पास ही एक संदूक में रखा गया है। साल में एक बार रमजान महीने के 28 वें रोजा और 29 वें शब को लोगों इसे निकाला जाता है। जिससे लोग जियारत (आम आदमी के दर्शन के लिए) कर सकें। हजरत शेखेदीन शेख अहमद मकदूम शाह रहमतुल्ला अलैह की दुआओं में बहुत ताकत होती है। मजार पर आने वाले लोगों की मुरादें अवश्य पूरी करते है। प्रभु यादव ने बताया कि ऐसे तमाम किस्से है। जो किसी अजूबे से कम नहीं है। यह किस्सा भी प्रचलित है कि अगर किसी को ऊपरी हवाओं ने घेर रखा है, तो मजार पर मत्था टेकने और पीछे के रास्ते बाहर निकले से बुरी आत्माओं से पीछा छूट जाता है। मजार पर पहुंचे शांति एकता कमेटी के सरपरस्त नेसार अहमद खान वारसी ने बताया कि दरगाह पर हर साल उर्स का आयोजन लगता है। इसमें नगर कस्बा सहित दूर दराज के ग्राम अंचलों से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं। दरगाह पर मुस्लिम हिन्दू लोगों की असीम श्रद्धा है। सलीम मंसूरी की रिपोर्ट जमानिया
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