काशी की पावन धरती पर जीवंत होगी ५०० वर्ष पुरानी नाग नथैया लीला: तुलसी घाट बनेगा भक्ति का अनुपम केंद्रवाराणसी, २५ अक्टूबर २०२५ काशी दीप विजन।कार्तिक मास की पवित्र बेला में काशी की गलियों में भक्ति का संगीत गूंज रहा है। देवी-देवता घाटों पर उतर आए हैं और गंगा की लहरें भक्तों की मनोकामनाओं को समेट रही हैं। इसी पावन अवसर पर आज शाम तुलसी घाट पर विश्व प्रसिद्ध 'नाग नथैया लीला' का आयोजन हो रहा है। यह लीला न केवल भगवान कृष्ण की कालिया नाग पर विजय की दिव्य कथा को जीवंत करती है, बल्कि काशी की सांस्कृतिक धरोहर को भी नई ऊर्जा प्रदान करती है। सैकड़ों वर्ष पुरानी यह परंपरा आज फिर से जीवंत हो उठेगी, जब तुलसी घाट वृंदावन का रूप धारण कर लेगा।तुलसी घाट, जो महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी की साधना स्थली के रूप में अमर है, आज भक्तों का संगम बनेगा। यहीं पर तुलसीदास ने 'श्री रामचरितमानस' की रचना की थी, और आज उसी पावन भूमि पर कृष्ण लीला का मंच सज रहा है। आयोजन शाम ४ बजे से प्रारंभ होगा, जिसमें बालकृष्ण कालिया नाग पर विजय प्राप्त करते हुए गंगा को क्षण भर के लिए यमुना में परिवर्तित कर देंगे। लगभग १५ मिनट तक चलेगी यह लीला, जो दर्शकों को भक्ति के आलोक में डुबो देगी। दूर-दूर से श्रद्धालु उमड़ रहे हैं, और घाट पर भारी भीड़ जुट चुकी है।ऐतिहासिक महत्व: ५०० वर्षों की जीवंत परंपरानाग नथैया लीला की जड़ें काशी की मध्यकालीन सांस्कृतिक परंपरा में निहित हैं। यह आयोजन लगभग ५०० वर्ष पुराना है, जिसकी शुरुआत १६वीं शताब्दी में हुई मानी जाती है। काशी, जो शिव की नगरी के रूप में जानी जाती है, ने भक्ति आंदोलन के दौरान वैष्णव परंपराओं को भी समाहित किया। इस लीला की प्रेरणा भगवत पुराण की कथा से ली गई है, जहां बालकृष्ण यमुना नदी में कालिया नाग के विषैले प्रभाव को समाप्त करते हैं। किंतु काशी में इसे स्थानीय रंग देकर प्रस्तुत किया जाता है—गंगा को यमुना का रूप देकर। यह लीला न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि काशी की सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक भी है।इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा भक्ति काल के कवियों और संतों की देन है, जिन्होंने काशी को राम-कृष्ण भक्ति का केंद्र बनाया। तुलसीदास के समकालीन वैष्णव आचार्यों ने इस लीला को घाटों पर मंचित किया, ताकि आम जनमानस भगवान की लीलाओं से जुड़ सके। आजादी के बाद भी यह परंपरा अक्षुण्ण रही, और अब डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर इसकी झलकियां वायरल हो रही हैं। यह लीला काशी की 'रामलीला' और 'कृष्णलीला' परंपराओं का अनूठा संगम है, जो हिंदू धर्म की विविधता को दर्शाती है।सांस्कृतिक मान्यता: भक्ति, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीककाशी में कार्तिक मास को 'महीना देवताओं का' कहा जाता है। इस दौरान घाटों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां सजाई जाती हैं, और भक्त गंगा स्नान कर पापों का नाश करते हैं। नाग नथैया लीला इसी मास की विशेषता है, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है। कालिया नाग पर विजय की कथा विषाक्त जल को शुद्ध करने की प्रतीकात्मकता रखती है, जो आज के जल प्रदूषण जैसे मुद्दों से जुड़ती है।सांस्कृतिक दृष्टि से, यह लीला काशी की लोककला को जीवंत करती है। स्थानीय कलाकार मूर्तियों को सजाते हैं, पारंपरिक वाद्ययंत्र बजते हैं, और नृत्य-नाटक के माध्यम से कथा का चित्रण होता है। महिलाएं और बच्चे इसमें सक्रिय भाग लेते हैं, जो लैंगिक समावेशिता को बढ़ावा देता है। पर्यटक भी इसकी ओर आकर्षित होते हैं, जो काशी को वैश्विक सांस्कृतिक हब बनाता है। संकट मोचन मंदिर जैसे संस्थान इस आयोजन को प्रोत्साहित करते हैं, और यह काशी की 'गुरुकुल' परंपरा को पुनर्जीवित करता है—जहां कला, धर्म और शिक्षा का मेल होता है।आज के आयोजन में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। प्रशासन ने यातायात प्रबंधन और भीड़ नियंत्रण के निर्देश जारी किए हैं। जैसे-जैसे सूर्यास्त नजदीक आ रहा है, तुलसी घाट पर उत्साह चरम पर है। यह लीला न केवल काशी की आत्मा को स्पर्श करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर भी साबित होगी।काशी में भक्ति की यह लहर हमें याद दिलाती है कि परंपराएं केवल इतिहास नहीं, बल्कि जीवंत ऊर्जा हैं। जय हो काशी की, जय हो नाग नथैया लीला की! लेखक:नवीन सिंह की रिपोर्ट।
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