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गुरुधाम आश्रम, लूंठा कलां,भगतुआ, वाराणसी। गुरुधाम आश्रम से जुड़े सभी भक्तों तथा क्षेत्रीय लोगों द्वारा हर्षोल्लास के साथ मनाया ‘श्री गुरू पूर्णिमा’ महोत्सव-जैसा कि विगत दिनों से बताया जा रहा था उसी के अनुरूप गुरुधाम आश्रम द्वारा निकट मुरारी चौक, बस स्टैंड वाराणसी के कामदगिरि वाटिका में ‘देव दुर्लभ’ श्री गुरू पूर्णिमा महोत्सव का कार्यक्रम हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ मनाया गया। असंख्य भक्तजनों की उपस्थिति में कार्यक्रम का शुभारम्भ विशाल मंच पर वेद पाठी युवाओं द्वारा वेदों की ऋचाओं के दिव्य गायन से हुआ। आश्रम के ब्रह्मज्ञानी संगीतज्ञों द्वारा गुरू की महिमा में तथा ईश्वर के गुणानुवाद में अनेक हृदयस्पर्शी भजनों का गायन करते हुए संगत को भाव-विभोर किया गया। बहन स्नेहा जी और भाई संजय जी इत्यादि ने संयुक्त रूप से मंच का संचालन करते हुए भजनों की सम्पूर्ण व्याख्या भी की। उन्होंने बताया मनुष्य जीवन की पूर्णता तभी जब पूर्ण गुरू का जीवन में पर्दापण हो जाए। गुरू द्वारा प्रदत्त पावन ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के उपरान्त ईश्वर दर्शन ही ‘ध्यान’ को जन्म देता है। अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर लेकर जाने और शिष्य का परम कल्याण करने का कार्य पूर्ण गुरू किया करते हैं। मानव जीवन में पूर्ण गुरू की महान भूमिका इतनी बड़ी है कि जीव को चौरासी के चक्रों से मुक्ति प्रदान कर उसका आवागमन सदा के लिए समाप्त कर देती है।कार्यक्रम में सदगुरू श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी अमरेश्वरा नन्द जी ने प्रवचन करते हुए बताया कि शताब्दियों पूर्व, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को महर्षि वेद व्यास जी का अवतरण हुआ था। वही वेद व्यास जी, जिन्होंने वैदिक ऋचाओं का संकलन कर चार वेदों के रूप में वर्गीकरण किया था। 18 पुराणों, 18 उप-पुराणों, उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र, महाभारत आदि अतुलनीय ग्रंथों को लेखनीबद्ध करने का श्रेय भी इन्हें ही जाता है। एैसे महान गुरुदेव के ज्ञान सूर्य की रश्मियों में जिन शिष्यों ने स्नान किया, वे अपने गुरुदेव का पूजन किए बिना न रह सके। इसलिए शिष्यों ने उनके अवतरण के मंगलमय एवं पुण्यमयी दिवस को पूजन का दिन चुना। यही कारण है कि श्री गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। तब से लेकर आज तक हर शिष्य अपने गुरुदेव का पूजन-वंदन इसी शुभ दिवस पर करता है। प्राचीन काल में गुरु पूर्णिमा का दिन एक विशेष दिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन केवल उत्सव नहीं, महोत्सव होता है।यह एक अविस्मरणीय अवसर है,अंत में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। सभी श्रद्धालुओं ने भंडारे का प्रसाद ग्रहण कर आज के दिवस को सार्थक किया। विशेष: कामदगिरि वाटिका के मालिक श्री गंगा राम यादव जी, श्री आज़ाद यादव जी एवम् उनके परिवार ने तीन दिन के लिए निःशुल्क स्थान उपलब्ध करा इस महान कार्यक्रम में अपना विशेष योगदान दिया है,धन्यवाद!भवदीय- गुरुधाम आश्रम, लूंठा कला, भगतुआ, वाराणसी। अनूप सिंह की रिपोर्ट वाराणसी

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