"सामाजिक बदलाव की आवाज बनी 'फुले', लेकिन बनारस के सिनेमाघरों ने दिखाई अनदेखी"समाचार:कई कठिनाइयों और संघर्षों के बाद, समाज सुधारक दंपति की प्रेरणादायक कहानी पर आधारित फिल्म 'फुले' आखिरकार 25 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। यह फिल्म जातिवादी और रूढ़िवादी सोच से ऊपर उठकर समाज के पिछड़े और दलित वर्ग के बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिलाने की संघर्षगाथा को दर्शाती है।हालांकि, बनारस जैसे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक शहर में इस महत्वपूर्ण विषय पर बनी फिल्म को निराशाजनक प्रतिक्रिया मिली। यहां के प्रमुख सिनेमा घरों — IP मॉल और JHV मॉल — ने फिल्म को प्रदर्शित ही नहीं किया, जिससे स्थानीय दर्शकों को 'फुले' देखने का अवसर नहीं मिल सका।जहां एक ओर 'फुले' समानता और शिक्षा के संदेश को लेकर समाज में जागरूकता फैलाने का प्रयास कर रही है, वहीं बनारस जैसे शहर में इसकी अनदेखी कई सवाल खड़े करती है। बावजूद इसके, 'फुले' अपने सामाजिक संदेश और परिवर्तन की भावना के साथ देशभर के दर्शकों के बीच धीरे-धीरे अपनी पहचान बना रही है। जतिन कुशवाहा की रिपोर्ट वाराणसी
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